Tuesday, February 11, 2020

गणेशजी के महोदर स्वरूप ने मोहासुर और एकदंत ने मदासुर को पराजित किया था

जीवन मंत्र डेस्क. बुधवार, 12 फरवरी को गणेश चतुर्थी व्रत है। इस तिथि के स्वामी भगवान श्रीगणेश हैं। हिन्दी पंचांग के अनुसार बुधवार को सुबह 7 बजे तक फाल्गुन मास की तृतीया और इसके बाद चतुर्थी तिथि रहेगी। चतुर्थी पर भगवान गणेश के व्रत करने की परंपरा है। उज्जैन के ज्योतिषाचार्य पं. मनीष शर्मा के अनुसार असुरों के संहार के लिए भगवान विष्णु की तरह गणेशजी ने भी अवतार लिए हैं। यहां जानिए किस राक्षस के अंत के लिए गणेशजी ने कौन सा अवतार लिया है...

महोदर स्वरूप - इस अवतार से संबंधित कथा के अनुसार जब कार्तिकेय स्वामी ने तारकासुर का वध कर दिया तो दैत्य गुरु शुक्राचार्य ने मोहासुर की मदद देवताओं पर आक्रमण कर दिया। सभी देवता गणेशजी के पास पहुंचे तो भगवान ने महोदर यानी बड़े पेट वाले गणेशजी का अवतार लिया। ये स्वरूप देखकर मोहासुर ने स्वयं ही पराजय स्वीकार कर ली और गणेशजी का भक्त बन गया।

वक्रतुंड स्वरूप - पुराने समय में मत्सरासुर नाम का असुर शिव भक्त था। उसे शिवजी ने वरदान दिया था। शुक्राचार्य के आदेश पर मत्सरासुर ने अपने पुत्र सुंदरप्रिय और विषयप्रिय के साथ देवताओं पर आक्रमण किया। देवताओं की रक्षा के लिए गणेशजी ने वक्रतुंड अवतार लिया। वक्रतुंड ने मत्सरासुर के पुत्रों का वध कर दिया और मत्सरासुर को परास्त कर दिया।

एकदंत स्वरूप - मद नाम के एक राक्षस ने दैत्य गुरु शुक्राचार्य से दीक्षा ली थी। मदासुर से सभी देवता त्रस्त थे। तब गणेशजी ने एकदंत स्वरूप में अवतार लिया और मदासुर को पराजित किया।

विकट स्वरूप - कामासुर ने शिवजी को प्रसन्न करके त्रिलोक विजय का वरदान प्राप्त किया। उसने देवताओं पर अत्याचार करना शुरू कर दिया। तब गणेशजी ने मोर पर विराजित विकट अवतार लिया और कामासुर को पराजित किया।

गजानन स्वरूप - लोभासुर नाम के दैत्य ने शिवजी को प्रसन्न किया और वरदान प्राप्त किया। उसने तीनों लोकों पर कब्जा कर लिया, तब गणेशजी ने गजानन अवतार लिया और लोभासुर को पराजित कर दिया।

लंबोदर स्वरूप - क्रोधासुर ने भी सभी देवताओं पर विजय प्राप्त कर ली थी। तब गणेशजी ने लंबोदर स्वरूप में अवतार लिया और क्रोधासुर को खत्म किया।

विघ्नराज स्वरूप - ममासुर ने सभी देवताओं को बंदी बना लिया था। तब देवताओं की प्रार्थना पर गणेशजी ने विघ्नराज अवतार लिया और ममासुर को पराजित करके सभी देवताओं को स्वतंत्र करवाया।

धूम्रवर्ण स्वरूप - अहंतासुर नाम के असुर को खत्म करने के लिए गणेशजी ने धूम्रवर्ण अवतार लिया था। इस स्वरूप का रंग धुंए जैसा था, इसीलिए धूम्रवर्ण कहलाए।



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