जीवन मंत्र डेस्क.रविवार, 23 फरवरी को फाल्गुन मास की अमावस्या है। हिन्दी पंचांग के अनुसार एक माह दो भागों में यानी शुक्ल पक्ष और कृष्ण पक्ष में बंटा रहता है। एक पक्ष 15 दिनों का होता है। शुक्ल पक्ष में चंद्र की कलाएं बढ़ती हैं यानी चंद्र बढ़ता है। कृष्ण पक्ष में चंद्र घटता है और अमावस्या पर पूरी तरह से अदृश्य हो जाता है। 24 फरवरी से शुक्ल पक्ष शुरू होगा और चंद्र बढ़ने लगेगा। 9 मार्च को पूर्णिमा पर चंद्र पूरे आकार में दिखाई देगा। जानिए अमावस्या तिथि से जुड़ी कुछ खास बातें...
उज्जैन के ज्योतिषाचार्य पं. मनीष शर्मा के अनुसार चंद्र की सोलह कलाएं बताई गई हैं और सोलहवीं कला को अमा कहा जाता है। इस तिथि पर सूर्य और चंद्र एक साथ एक ही राशि में स्थित होते हैं। 23 फरवरी को ये दोनों ग्रह कुंभ राशि में रहेंगे। इस संबंध में स्कंदपुराण में लिखा है कि-
अमा षोडशभागेन देवि प्रोक्ता महाकला।
संस्थिता परमा माया देहिनां देहधारिणी।।
इस श्लोक के अनुसार अमा को चंद्र की महाकला गया है, इसमें चंद्र की सभी सोलह कलाओं की शक्तियां रहती हैं। इस कला का क्षय और उदय नहीं होता है।
अमावस्या पर पितरों के लिए जलाएं धूप-दीप
अमावस्या तिथि के स्वामी पितृदेव माने गए हैं। इसलिए अमावस्या पर पितरों की तृप्ति के लिए तर्पण, श्राद्ध कर्म और, धूप-ध्यान और दान-पुण्य करने का महत्व है। अमावस्या पर किसी पवित्र नदी में स्नान करने की परंपरा है। इस दिन मंत्र जाप, तप और व्रत करने की परंपरा है।
स्नान के बाद सूर्यदेव को जल चढ़ाएं और ऊँ सूर्याय नम: मंत्र का जाप करें।
अमावस्या पर किसी शिव मंदिर जाएं और तांबे के लोटे में जल भरकर अभिषेक करें। ऊँ नम: शिवाय मंत्र का जाप करें।
इस दिन हनुमानजी के सामने दीपक जलाएं और हनुमान चालीसा का पाठ करें।
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