भव्य श्रीवास्तव. “बुद्धं शरणं गच्छामि” बौद्ध धर्म को जानने वालों के लिए मूलमंत्र है। इसकी दो और पंक्तियों में “संघं शरणं गच्छामि” और “धम्मं शरणं गच्छामि” भी है। बौद्ध धर्म की मूल भावना को बताने वाले ये तीन शब्द गौतम बुद्ध की शरण में जाने का अर्थ रखते हैं। बुद्ध को जानने के लिए उनकी शिक्षाओं की शरण लेना जरूरी है। पर, इस ब्रह्मवाक्य के अर्थ केवल शब्दों तक सीमित नहीं है।
गौतम बुद्ध के बुद्धत्व की कथा को जिन किताबों में लिखा गया वो संकलन त्रिपिटक कहा जाता है। ये पालि भाषा में तिपिटक कहलाता है। यही वो पुस्तक है, जहां से बुद्ध के जीवन में बुद्धत्व घटित होने के बाद की हर बात लिखी गई है। दरअसल, बुद्ध का जीवन 35वें साल में तब बदला जब उन्हें वैशाखी पूर्णिमा के दिन पीपल के वृक्ष के नीचे बोधि हुई। इसके बाद 80 साल तक वे उस समय की लोकप्रिय भाषा संस्कृत की बजाय सरल लोकभाषा पालि में प्रचार करने लगे। बौद्ध धर्म के प्रचार के लिए बुद्ध ने सारनाथ के प्रथम उपदेश के बाद पांच मित्रों को अपना अनुयायी बनाया और उन्हें धर्म प्रचार लिए भेजा। संघों का निर्माण इसी के साथ शुरू हुआ और बुद्ध की सौतेली मां महाप्रजापति गौतमी उनके पहले बौद्ध संघ की सदस्या बनीं।
संघ के निर्माण के लिए नियमों की जरूरत थी।और यहीं से त्रिपटिक की संरचना का कार्य शुरू हुआ। उपाली नाम के एक बौद्ध ने, जो जाति से शूद्र थे, सबसे पहले विनय पिटक की रचना की। इसी में पहली बार “बुद्धं शरणं गच्छामि” का जिक्र आया। ये पुस्तक बौद्ध भिक्षुओं और भिक्षुणियों के लिए नियमावली थी। इसके बाद बुद्ध के सबसे प्रिय शिष्य आनंद ने सुत्त पिटक की रचना की, जिसके पांच अंग है। इस पुस्तक में बुद्ध की शिक्षाओं को पांच तरीकों से बताया गया है। और, आखिरी में लिखी गई अभिधम्म पिटक जिसमें दार्शनिक सिद्धांतों का वर्णन है।
“बुद्धं शरणं गच्छामि” का जिक्र पहली विनय पटिक मे किया गया। दरअसल, विनय का अर्थ यहां अनुशासन से है और पटिक मतलब टोकरा। यानि अनुशासन का टोकरा। तो, जो भी बौद्ध धर्म अपनाकर इसके मार्ग पर चलता उसके लिए यहीं से मार्ग मिलता। और “बुद्धं शरणं गच्छामि” वो पहला वाक्य होता जिसे अपनाना होता था।
(लेखक धर्म पत्रकार है और रिलीजन वर्ल्ड के संस्थापक हैं।)
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