Tuesday, September 1, 2020

जब अजय देवगन ने 'फूल और कांटे' में अक्षय को किया था रिप्लेस, सुपरस्टार ने खुद सुनाई थी पूरी कहानी

जब अजय देवगन ने 'फूल और कांटे' में अक्षय को किया था रिप्लेस, सुपरस्टार ने खुद सुनाई थी पूरी कहानी

सुपरस्टार अक्षय कुमार और अजय देवगन ने एक ही साल में बतौर हीरो बॉलीवुड में डेब्यू किया था। वह साल था 1991। लीड एक्टर के तौर पर अक्षय की पहली फिल्म 'सौगंध' बॉक्स ऑफिस पर बुरी तरह फ्लॉप साबित हुई थी। वहीं, अजय देवगन को उनकी पहली फिल, 'फूल और कांटे' ने रातोंरात स्टार बना दिया था। लेकिन क्या आप जानते हैं कि 'फूल और कांटे' अजय से पहले अक्षय कुमार को ऑफर हुई थी?

खुद अक्षय ने किया था यह खुलासा

अक्षय और अजय रोहित शेट्टी की कॉप ड्रामा 'सूर्यवंशी' में स्क्रीन शेयर कर रहे हैं। इसी साल मार्च में फिल्म के ट्रेलर लॉन्च पर अक्षय ने बताया था 'फूल और कांटे' में अजय ने उन्हें रिप्लेस कर दिया था। अक्षय ने कहा था, "हम दोनों ने अपना कॅरियर साथ में शुरू किया था। ऐसा शुरू किया था कि एक ही फिल्म के लिए दोनों लड़े थे। इसकी पहली फिल्म 'फूल और कांटे' में पहले मैं था। फिर इसने मुझे धक्का मार दिया।"

ऐसी है रिप्लेस किए जाने की कहानी

अक्षय ने कुछ साल पहले एक इंटरव्यू में कहा था, "जी हां, मैं 'फूल और कांटे' में था। मैं सनी सुपर साउंड (रिकॉर्डिंग स्टूडियो) में नदीम-श्रवण के साथ म्यूजिक सेशन में बैठा था। उन दिनों हर गाने में 30-40 वायलिन बजने वाले होते थे। एक सेपरेट ऑर्केस्ट्रा। अब तो हम एक पल में सबकुछ खत्म कर देते हैं। रात को मैं पहले दिन के लिए शूट के लिए तैयार हो रहा था। और फिर मुझे एक कॉल आया कि भैया आप मत आना, कोई और आ रहा है।"

किस्सा यह भी: एक शाम को बदली थी जिंदगी

अक्षय कुमार फिल्म अभिनेता बनने से पहले मॉडल थे और उस शाम भी वे मॉडलिंग के एक सिलसिले में बैंगलोर (अब बेंगलुरु) जा रहे थे। तभी मेकअप मैन प्रमोद चक्रवर्ती की कंपनी ने उनसे पूछा कि क्या वे एक्टर बनना चाहता हैं? तब अक्षय ने उन्हें अपना पोर्टफोलियो दिखाया और तुरंत उन्हें तीन फिल्मों का ऑफर मिल गया।

अक्षय ने एक इंटरव्यू में कहा था, "मैं हैरान था। उन्होंने (प्रमोद चक्रवर्ती) मुझे तुरंत तीन फिल्मों के लिए साइन कर लिया। पहली फिल्म के लिए उन्होंने मुझे 5 हजार, दूसरी के लिए 50 हजार और तीसरी फिल्म के लिए 1.50 लाख रुपए का चैक दिया था। जिस वक्त उन्होंने मुझे ये चैक दिए, तब शाम के 6 बज रहे थे। अगर मैं बैंगलोर चला गया होता तो यह मेरे लिए किसी आपदा से कम नहीं होता। आज मैं कहीं एक रिटायर्ड मॉडल के रूप में होता। इसलिए जो होता है, अच्छे के लिए होता है।"



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अक्षय कुमार ने 'सौगंध' से डेब्यू करने से पहले महेश भट्ट की फिल्म 'आज' (1987) में छोटी सी भूमिका निभाई थी। (फोटो: अजय देवगन और अक्षय कुमार 'सूर्यवंशी' के ट्रेलर लॉन्च के दौरान। )


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Monday, August 31, 2020

दवा की तय कीमत से ज्यादा वसूलने पर भी लाइसेंस रद्द करना मुश्किल, सिर्फ जुर्माना वसूल सकती हैं एजेंसियां

दवा की तय कीमत से ज्यादा वसूलने पर भी लाइसेंस रद्द करना मुश्किल, सिर्फ जुर्माना वसूल सकती हैं एजेंसियां

नेशनल फार्मास्यूटिकल प्राइसिंग अथॉरिटी (एनपीपीए) की ओर से दवा की कीमत तय करने के बाद भी यदि दवा कंपनियां इससे ज्यादा कीमत वसूल करती है तो इन कंपनियों का लाइसेंस रद्द नहीं किया जा सकता। ड्रग्स कंसलटेटिव कमेटी ने कहा है कि ड्रग्स एंड कॉस्मेटिक्स रूल्स में ऐसा कोई प्रावधान नहीं है, जिससे लाइसेंस रद्द किया जा सके।

डीटीएबी ने भी लाइसेंस रद्द करने से इनकार किया था

इससे पहले ड्रग्स टेक्निकल एडवाइजरी बोर्ड (डीटीएबी) ने भी ऐसी कंपनियों के लाइसेंस रद्द करने से इनकार कर दिया था। संसद की स्थाई समिति ने अपनी 54वीं रिपोर्ट में कहा है कि दवा कंपनी यदि तय कीमत से ज्यादा पैसा वसूल करती हैं, या अपनी मर्जी से दवा की कीमत तय करती है तो इनसे ब्याज सहित जुर्माना वसूला जाए। जुर्माना नहीं देने पर कंपनियों के लाइसेंस रद्द करने पर विचार करें। स्वास्थ्य मंत्रालय से भी कहा है यदि जरुरत पड़े तो ड्रग्स प्राइस कंट्रोल ऑर्डर (डीपीसीओ) और ड्रग्स एंड कॉस्मेटिक्स रूल्स में जरुरी बदलाव करें।

मनमाने तरीके से कीमत बढ़ाने वाली कंपनियों से जुर्माना वसूला जाए

एनपीपीए का कहना है कि कीमत तय करने के बाद भी जिन कंपनियों ने दवा की कीमत बढ़ाई, ऐसी कंपनियों से जुर्माना वसूल करने के लिए 2083 नोटिस भेजे गए हैं। मार्च-2020 तक छह हजार 406 करोड़ रुपए से ज्यादा का जुर्माना किया गया है। लेकिन, सिर्फ 960 करोड़ रुपए की वसूली हो पाई है। वहीं चार हजार 33 करोड़ रुपए का मामला अदालत में चल रहा है। एनपीपीए के पास सिर्फ जुर्माना लगाने का अधिकार है।

एनपीपीए ऐसे तय करती है किसी दवा की कीमत

जब कोई कंपनी नई दवा लाती है, चाहे वही दवा किसी अन्य कंपनी की बाजार में हो तो उसकी कीमत एनपीपीए तय करती है। उस कंपोजिशन की दवा जो पहले से बाजार में है, पांच कंपनियों की औसत कीमत निकालकर नई कंपनी की दवा की कीमत तय की जाती है। कुछ कंपनियां एनपीपीए को बताती ही नहीं हैं, और अपनी मर्जी से कीमत तय कर देती हैं। इसके अलावा नेशनल लिस्ट ऑफ एसेंशिएल मेडिसिन (एनईएलएम) की कीमत भी एनपीपीए तय करती है। एनपीपीए का कहना है कि दवाओं की कीमत तय या कैपिंग करके हर वर्ष उपभोक्ताओं का 12 हजार 447 करोड़ रुपए बचाया जाता है।



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जब कोई कंपनी नई दवा लाती है चाहे वही दवा किसी अन्य कंपनी की बाजार में हो तो उसकी कीमत एनपीपीए तय करती है। (प्रतीकात्मक)


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बिजली डिमांड और वाहनों की बिक्री के आंकड़े हमारी अर्थव्यवस्था की ताकत बताते हैं, लेकिन मांग पहले जैसी हुई तो ये चुनौती होगी

बिजली डिमांड और वाहनों की बिक्री के आंकड़े हमारी अर्थव्यवस्था की ताकत बताते हैं, लेकिन मांग पहले जैसी हुई तो ये चुनौती होगी

स्कंद विवेक धर/शरद पाण्डेय. पॉवर डिमांड और वाहनों की बिक्री के आंकड़े इस बात के प्रमाण हैं कि देश की अर्थव्यवस्था में लगातार सुधार हो रहा है। अगर मांग अचानक पुराने स्तर पर पहुंची तो तुरंत आपूर्ति सुनिश्चित करना इंडस्ट्री के लिए बड़ी चुनौती होगी। जाने-माने बैंकर और उद्योग संगठन सीआईआई के अध्यक्ष उदय कोटक ने दैनिक भास्कर के साथ इंटरव्यू में ये बात कही। उन्होंने कहा कि रेलवे के फ्रेट ट्रैफिक और पीक पॉवर डिमांड के आंकड़ों से यह साफ दिख रहा है कि अर्थव्यवस्था आगे बढ़ रही है।

एक और बड़ा सुधार ऑटोमोबइल सेक्टर में हो रहा है, जहां अगस्त महीने में पैसेंजर व्हीकल और दोपहिया गाड़ियों की बिक्री में वर्ष दर वर्ष आधार पर इजाफा होने की उम्मीद है। कुछ सेक्टरों ने वर्क फ्राॅम होम शुरू कर दिया है, लेकिन ज्यादातर सेक्टर में कर्मचारियों की उपस्थिति जरूरी है। 55 सेक्टर पर किए गए सीआईआई एसकॉन सर्वे के अनुसार जुलाई-सितंबर के बीच 55% उद्योगों के 50% से कम क्षमता के साथ काम करने का अनुमान है।

प्रस्तावित नेशनल इंफ्रास्ट्रक्चर पाइपलाइन इंडस्ट्री को और अधिक प्रतिस्पर्धी बनाएगा और पीएलआई योजना से शुरुआती निवेश को प्रोत्साहन मिलेगा। ये सब कारण देश को नया मैन्युफैक्चरिंग हब बना सकते हैं। हालांकि, इसके लिए इंडस्ट्री और सरकार दोनों को कदम उठाने होंगे। भारत में पहले से ही बड़े पैमाने पर मैन्यूफैक्चरिंग होती है। हालांकि, मैन्युफैक्चरिंग स्केल कई गुना बढ़ाए जाने की संभावना अभी बनी हुई है। उन्होंने इंडस्ट्री से जुड़े इन सवालों के भी जवाब दिए...

कोरोना से क्या कोई सबक सीखने को मिला?

लॉकडाउन जरूरी था, हालांकि लोगाें की अजीविका का नुकसान हुआ है। इससे सीख मिली कि महत्वपूर्ण संसाधानों को इस तरह डिजाइन करना होगा, जिससे अजीविका सुरक्षित रहे और संक्रमण का खतरा कम हो।

क्या इंडस्ट्री ने रणनीति में कोई बदलाव किया है?

जी हां, इंडस्ट्री ने अपनी रणनीति बदल दी है। ज्यादातर कंपनियां फिजिकल ऑपरेशन से डिजिटल ऑपरेशन की ओर शिफ्ट हो रही हैं। तकनीकी आधारित निवेश जल्द ही एक ट्रेड के रूप में उभर सकता है।

उद्योग जगत की सरकार से क्या अपेक्षाएं हैं?

इंडस्ट्री को सरकार से ऐसी पार्टनरशिप की उम्मीद है, जिसमें वह इन्वेस्टमेंट क्लाइमेट में सुधार के लिए इंडस्ट्री के सुझावों पर भरोसा कर सके। वहीं, इंडस्ट्रीज से उम्मीद की जानी चाहिए कि वह सरकार की ओर से सुझावों को स्वीकारे और अमल के बाद निवेश करे।

चीन से कैसे प्रतिस्पर्धा कर सकते हैं?

इसके लिए इनपुट कास्ट और जमीन की कीमत कम करनी होगी। श्रमिकों को स्किल ट्रेनिंग देकर क्वालिटी और उपलब्धता में सुधार की जरूरत होगी। चीन से आयात में माल पर आयात शुल्क बढ़ाना भी बेहतर रणनीति का हिस्सा होगा।

देश को आत्मनिर्भर बनने में कितना समय लगेगा?

सभी सेक्टरों में आत्मनिर्भर बनना जरूरी नहीं है, लेकिन हमे कुछ सेक्टरों जैसे फार्मास्यूटिकल्स, मेडिकल उपकरण और सुरक्षा मामलों पर फोकस करना चाहिए।



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इंडस्ट्रीज से उम्मीद की जानी चाहिए कि वह सरकार की ओर से सुझावों को स्वीकारे और अमल के बाद निवेश करे। (उदय कोटक)


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यह शर्मिंदगी की बात है कि देश के छात्र असमंजस में हैं, महामारी और लॉकडाउन ने उनके सपनों को पीछे धकेल दिया है

यह शर्मिंदगी की बात है कि देश के छात्र असमंजस में हैं, महामारी और लॉकडाउन ने उनके सपनों को पीछे धकेल दिया है

कोरोना की वजह से छात्र समुदाय बहुत परेशान है। अपनी शिक्षा पर बहुत समय, मेहनत और पैसा खर्च करने के बाद उन्हें अपनी योजनाएं बिगड़ती दिख रही हैं। साथ भी भविष्य अनिश्चित हो गया है। महामारी और फिर लॉकडाउन ने उनके सपनों को पीछे धकेल दिया है।

ऐसे में उन्हें इस असमंजस में डालना और भी बुरा है कि वे सेहत चुनें या अपना अकादमिक भविष्य। शर्मिंदगी की बात है कि अभी इसी स्थिति का सामना नेशनल एलिजिबिटी एंट्रेंस टेस्ट (नीट) और जॉइंट एंट्रेंस एग्जामिनेशन (जेईई) की तैयारी कर रहे छात्रों को करना पड़ रहा है, जिनकी परीक्षाएं इस महीने होनी हैं।

वैज्ञानिक कहते हैं कि अभी भीड़ से बचना चाहिए

नीट और जेईई पहले अप्रैल और मई में होनी थीं, लेकिन दो बार आगे बढ़ाई जा चुकी हैं। इसका मतलब सरकार ने सोचा कि जब भारत में 50 हजार कोरोना मरीज थे, तब इन बड़ी परीक्षाओं को आगे बढ़ाना सही था, लेकिन अब जब कोरोना के मामले 36 लाख के पार जा चुके हैं, सरकार को परीक्षा हॉल में हजारों छात्रों की भीड़ इकट्‌ठा करना सही लग रहा है।

यह अतार्किक और खतरनाक है। कोविड-19 की वैज्ञानिक समझ कहती है कि मौजूदा स्थिति में बड़े आयोजन नहीं करने चाहिए, भीड़ से बचना चाहिए और वायरस को फैलने से रोकना चाहिए। यह स्वाभाविक है कि जनस्वास्थ्य के नाम पर नीट और जेईई वैयक्तिक रूप से नहीं होनी चाहिए।

केरल से भी कुछ सीख नहीं लिया

हमने पहले भी भीड़ का नतीजा देखा है, जब केरल इंजीनियरिंग, आर्किटेक्ट एंड मेडिकल (केईएएम) परीक्षाएं जुलाई में हुई थीं। मैंने संक्रमण फैलने के जोखिम को लेकर चिंता जताते हुए केरल के मुख्यमंत्री को चिट्‌ठी लिखी थी और परीक्षा आगे बढ़ाने का निवेदन किया था। मेरा निवेदन अस्वीकार किया गया और आपदा शुरू हो गई। सोशल डिस्टेंसिंग के लिए प्रयास नहीं किए गए और परीक्षा में शामिल होने वालों की संख्या सीमित न करने के कारण केंद्रों पर भारी भीड़ रही। इससे वहां कोविड-19 मामलों में तेजी से बढ़त आई।

नीट-जेईई होने से भयावह स्थिति हो सकती है
नीट-जेईई तो और बड़े स्तर पर होंगी। करीब 25 लाख छात्र पंजीकृत हैं। इससे केईएएम परीक्षा के आयोजन से भी कई गुना बुरी और भयानक स्थिति का पूर्वाभास होता है। नीट-जेईई सितंबर में होनी ही नहीं चाहिए। इन्हें कम से कम नवंबर, दीवाली के बाद तक के लिए आगे बढ़ाना चाहिए था।
अगर आगे की यह तारीख व्यवहारिक नहीं लगती, तो सरकार का यह कहना सही है कि छात्रों पर पूरा अकादमिक वर्ष बर्बाद करने का दबाव नहीं बना सकते। ऐसे में मेरा मत है कि छात्रों और परीक्षा लेने वालों, दोनों के लिए ही व्यवहारिक, सुरक्षित और सम्मानजनक तरीका यह होगा कि परीक्षाएं घर से हों।

इससे छात्रों को अपने घर की सुरक्षा में परीक्षा देने मिलेगी। साथ ही परीक्षा केंद्रों पर भीड़ इकट्‌ठी नहीं होगी, जिसके कोरोना के ‘सुपर स्प्रैडर’ बनने की आशंका रहती है। जो छात्र किसी कारण से घर से परीक्षा नहीं दे सकते, सरकार को उनके लिए ऑनलाइन परीक्षा की सुविधा वाले टेस्टिंग सेंटर बनाने चाहिए थे। ऐसे छात्रों की संख्या कम ही होगी इसलिए ऐसे केंद्रों पर सोशल डिस्टेंसिंग बनाए रखना आसान होगा और संक्रमण का जोखिम कम होगा।

स्वाभाविक है कि परीक्षा देने वाले के अकादमिक हुनर को आंकने के लिए परीक्षाओं को फिर से डिजाइन करना पड़ता, ताकि यह नई परिस्थितियों में सही बैठ पाएं। जिन कौशलों की जांच की जा रही है, वे सामान्य परीक्षा से अलग होंगे। इसमें छात्रों के घर में उपलब्ध अध्ययन और संदर्भ सामग्रियों को ध्यान में रखना होगा। इस परीक्षा को रटने पर आधारित परीक्षा से हटाकर छात्रों के तथ्यों को याद करने और तर्क तथा विश्लेषण की क्षमता पर लाना होगा।
यह बड़ा बदलाव शायद परीक्षा लेने वालों के लिए चुनौती हो, जो पीढ़ियों से एक ही तरह से परीक्षा ले रहे हैं। इससे छात्रों को भी कुछ परेशानी हो सकती है, जो पारंपरिक तरीकों से ही परीक्षा देते आए हैं। लेकिन इस महामारी ने हमें अपने सारे अनुमानों पर सवाल उठाने और बिल्कुल नए तरीके अपनाने पर मजबूर कर दिया है। अभी हमेशा की ही तरह काम करने में काफी जोखिम और समस्याएं हैं और नीट तथा जेईई के आयोजन में तो निश्चित तौर पर ऐसा ही है।

छात्रों ने कड़ी मेहनत की, अब उनके सेहत से खिलवाड़ नहीं होना चाहिए
जैसा कि महामारी के पूरे विध्वंस के दौरान होता रहा है, परीक्षा के आयोजन की पहेली के लिए कोई सही समाधान नहीं है। हालांकि, घर से परीक्षा के माध्यम से यह सुनिश्चित किया जा सकता है कि जिन हजारों-लाखों छात्रों ने अपने सपनों को हासिल करने के लिए इतनी कड़ी मेहनत की है, आखिरी समय में उनकी सेहत से समझौता न हो।

सरकार को अब भी इस स्थिति की गंभीरता को स्वीकार करना चाहिए। महामारी के चरम पर अदूरदर्शी और बिना सोचे-समझे लिए गए फैसले को सीखने की चाहत रखने वालों के उजले भविष्य के रास्ते में बाधा नहीं बनना चाहिए। हमें अपने देश की खातिर, अपने भविष्य के निर्माताओं और नायकों को सुरक्षित रखना चाहिए। (ये लेखक के अपने विचार हैं)



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शशि थरूर, पूर्व केंद्रीय मंत्री और सांसद


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चीन का सामना करने के लिए अमेरिका को जर्मनी के साथ साझेदारी करनी चाहिए

चीन का सामना करने के लिए अमेरिका को जर्मनी के साथ साझेदारी करनी चाहिए

अगर जो बाइडेन राष्ट्रपति चुने जाते हैं तो उनकी सबसे बड़ी विदेश नीति चुनौती चीन होगा। लेकिन यह वह चीन नहीं होगा जिसका सामना उन्होंने बराक ओबामा के साथ किया था। यह ज्यादा आक्रामक चीन होगा, जो अमेरिका के तकनीक में प्रभुत्व को उखाड़ना चाहेगा, हांगकांग मे लोकतंत्र का दम घोंटेगा और आपका निजी डेटा चुराएगा।

वैश्विक व्यापार तंत्र को बिगाड़े बिना चीन को दबाने के लिए जर्मनी के साथ साझेदारी की जरूरत पड़ेगी, जिसे बनाने में ट्रम्प असफल रहे हैं। जी हां, आपने सही पढ़ा? सोवियत संघ के साथ शीत युद्ध बर्लिन में लड़ा और जीता गया। और चीन के साथ भी व्यापार, तकनीक और वैश्विक प्रभाव पर शीत युद्ध बर्लिन में लड़ा और जीता जाएगा। जैसा बर्लिन करता है, वैसा ही जर्मनी करता है और जैसा जर्मनी करता है, वैसा ही यूरोपियन संघ करता है, जोकि दुनिया का सबसे बड़ा सिंगल मार्केट है। और जो भी देश यूरोपियन संघ को अपनी तरफ कर लेगा, वहीं 21वीं सदी में डिजिटल कॉमर्स के नियम तय करेगा।

चीन का सामना करने के लिए गठबंधन जरूरी

‘द राइज एंड फाल ऑफ पीस ऑन अर्थ’ के लेखक माइकल मंडेलबॉम कहते हैं, ‘पहले और दूसरे विश्वयुद्ध तथा शीत युद्ध में अमेरिका जीतने वाले पक्ष में था, क्योंकि हम मजबूत गठबंधन में थे। पहले विश्वयुद्ध से हम देर से जुड़े, दूसरे विश्वयुद्ध में कम देर से जुड़े। शीत युद्ध में सोवियत संघ को हराने का गठबंधन हमने बनाया। चीन का सामना करने के लिए हमें यही मॉडल अपनाना चाहिए था।’

अगर हम इसे केवल अमेरिका को महान बनाने के लिए चीन के खिलाफ खड़े होने की कहानी बना देंगे तो हम हार जाएंगे। अगर हम इसे दुनिया बनाम चीन की कहानी बनाएंगे तो हम बीजिंग को झुका सकते हैं। ट्रम्प ने चीन की अर्थव्यवस्था को स्थायी रूप से खोलने के लिए कोई कदम नहीं उठाए। खबरों के मुताबिक, ‘डील के बाद से चीन ने अमेरिकी बैंंकों और किसानों के लिए अपने बाजार खोलने के लिए कदम उठाए हैं, लेकिन वह अमेरिकी उत्पाद खरीदने के मामले में अब भी बहुत पीछे है।’

चीन के लायक हैं राष्ट्रपति ट्रम्प

ट्रम्प चीन पर पिछले किसी भी राष्ट्रपति से ज्यादा सख्त रहे हैं, जो ठीक भी है। चीन में व्यापार करने वाला मेरा एक दोस्त कहता है, ‘ट्रम्प वे अमेरिकी राष्ट्रपति नहीं हैं, जिसके लायक अमेरिका है। लेकिन वे वह राष्ट्रपति हैं, जिसके लायक चीन है।’

लेकिन मैं ‘चीन’ शब्द की जगह ‘130 करोड़ चीनी भाषी’ कहना पसंद करता हूं। क्योंकि, तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्था वाले 130 करोड़ चीनी भाषियों का व्यवहार ट्रम्प की ‘अमेरिका-पहले-अमेरिका-अकेले’ रणनीति वाले 32.8 करोड़ लोग आसानी से नहीं बदल पाएंगे।

इसलिए मुझे लगता है कि ट्रम्प द्वारा चीन और जर्मनी पर विभिन्न मुद्दों के लिए एक साथ प्रहार करना ठीक नहीं है। ट्रम्प को चांसलर एंगेला मर्केल के साथ साझेदारी को प्राथमिकता देनी चाहिए थी, जो चीन की गुंडागर्दी को लेकर हमारी ही तरह चिंतित हैं। जर्मनी मैन्यूफैक्चरिंग सुपरपॉवर है, जो चीन के खिलाफ व्यापार युद्ध में महत्वपूर्ण सहयोगी साबित हो सकता है।

जर्मनी के लोग अमेरिका के साथ संबंधों को ज्यादा तवज्जो दे रहे

अब ट्रम्प भी वहां से अपने कुछ सैनिक वापस बुलाकर जर्मनी पर जोर दे रहे हैं। इसका नतीजा है कि मई 2019 में प्यू रिसर्च ने बताया कि जर्मनी के लोग चीन की तुलना में अमेरिका के साथ संबंधों को ज्यादा प्राथमिकता दे रहे हैं। आज 37% जर्मन अमेरिका के साथ संबंधों को प्राथमिकता दे रहे हैं, जबकि 36% चीन को। राष्ट्रपति बनने पर ट्रम्प ने ट्रांस-पैसिफिक साझेदारी समझौता खत्म कर दिया, जिसने अमेरिका के हित में 21वीं सदी के मुक्त व्यापार नियम तय किए थे और जिसमें चीन को छोड़कर 12 बड़ी पैसिफिक अर्थव्यवस्थाएं शामिल थीं। और अब वे जर्मनी के साथ संबंधों को कमजोर कर रहे हैँ।

इस सबके बीच ट्रम्प के सेक्रेटरी ऑफ स्टेट माइक पॉम्पिओ ने घोषणा कर दी, ‘चीनी कम्युनिस्ट पार्टी से आजादी हमारा मिशन है और अब हम चीन को कमजोर करने के लिए समान सोच रखने वाले लोकतंत्रों के साथ गठजोड़ कर नया समूह बनाएंगे।’ यह सुनकर मैं नि:शब्द हो गया।

बिना सहयोगियों के गठबंधन बनाना मुश्किल है। अगर वाकई में यह हमारा ‘मिशन’ है, तो आप रूस को लक्ष्य करने के लिए जर्मन डिफेंस द्वारा किए जा रहे खर्च के खिलाफ छोटी-छोटी शिकायत करना बंद क्यों नहीं कर देते? यह सच है कि यूरोपीय संघ के देश वाशिंगटन और बीजिंग के बीच जारी गोलीबारी में फंसने और अमेरिकी या चीनी टेक्नोलॉजी इकोसिस्टम में से किसी एक को चुनने को लेकर सजग हैं। हालांकि पिछले साल यूरोपीय संघ ने चीन को ‘प्रणालीगत प्रतिद्वंद्वी’ बताया था।

चीन जिस चीज से सबसे ज्यादा डरता है, ट्रम्प ने उसे ही बनाने से इनकार कर दिया है। यानी वाशिंगटन और बर्लिन के इर्द-गिर्द बनाया गया अमेरिका और यूरोपियन यूनियन का संयुक्त गठबंधन, जिसमें ट्रांस-पैसिफिक साझेदारी शामिल है। सोवियत संघ को रोकने के लिए 1970 के दशक में रिचर्ड निक्सन और हेनरी किसिंगर की सबसे अच्छी चाल थी अमेरिका और चीन का गठबंधन बनाना। आज चीन को संतुलित करने के लिए सबसे अच्छी चाल होगी अमेरिका और जर्मनी के बीच गठबंधन बनाना। (ये लेखक के अपने विचार हैं)



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थाॅमस एल. फ्रीडमैन, तीन बार पुलित्ज़र अवॉर्ड विजेता एवं ‘द न्यूयॉर्क टाइम्स’ में नियमित स्तंभकार


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रैना के हटने के बाद हरभजन के खेलने पर भी संशय, चेन्नई सुपरकिंग्स के जोश हेजलवुड भी हालात को लेकर फिक्रमंद

रैना के हटने के बाद हरभजन के खेलने पर भी संशय, चेन्नई सुपरकिंग्स के जोश हेजलवुड भी हालात को लेकर फिक्रमंद

चेन्नई सुपर किंग्स से जुड़े 13 सदस्यों के कोरोना पॉजिटिव आने के बाद फ्रेंचाइजी के दूसरे खिलाड़ी परेशान हैं। सुरेश रैना पहले ही घर लौट चुके हैं। हरभजन सिंह के भी खेलने पर संशय है। वे मंगलवार को दुबई जाने वाले हैं। हरभजन से जुड़े एक सूत्र ने कहा- वे चिंतित हैं और खुद के कार्यक्रम में बदलाव कर सकते हैं या हट सकते हैं। इस बीच, सीएसके के ऑस्ट्रेलियन तेज गेंदबाज जोश हेजलवुड भी चिंतित हैं। लीग के ब्रॉडकास्टर का एक क्रू मेंबर पॉजिटिव आया है।

हर फ्रेंचाइजी 46 करोड़ के नुकसान का मुआवजा मांग रही, बोर्ड का इनकार

कोरोना के कारण मैच बिना फैंस के खेले जाने हैं। स्पाॅन्सर से मिलने वाली राशि में भी कमी आई है। ऐसे में सभी फ्रेंचाइजी बोर्ड से मुआवजा मांग रही हैं। हर टीम को लगभग 46 करोड़ रुपए के नुकसान का अनुमान है। लेकिन, बोर्ड ने इससे इनकार किया है।

बोर्ड के एक अधिकारी ने कहा, ‘फ्रेंचाइजीज का मुआवजे के बारे में सोचना मूर्खतापूर्ण है। अगर लीग नहीं होती तो उन्हें कुछ नहीं मिलता। आयोजन के लिए विभिन्न एजेंसियों को पैसा कौन दे रहा है। मैच ऑपरेशन का खर्च कौन उठा रहा है।’

इस अफसर ने आगे कहा, ‘हमने साफ कर दिया है कि कोई मुआवजा नहीं मिलेगा। टीमें दबाव बना रही हैं। क्या वे पैसे नहीं कमा रहीं। हर टीम लगभग 150 करोड़ कमाएगी। उनकी मांग ठीक नहीं है।’ राज्य संघ के एक सदस्य ने कहा, ‘इस तरह की बातें फ्रेंचाइजी से नहीं की जा रही हैं। बोर्ड का एक व्यक्ति निजी कारणों से इन बातों को उकसा रहा है।’



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हरभजन से जुड़े एक सूत्र ने कहा- वे चिंतित हैं और खुद के कार्यक्रम में बदलाव कर सकते हैं या हट सकते हैं। (फाइल)


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ऑनलाइन गेमिंग का रेवेन्यू 22% की रफ्तार से बढ़ रहा; 2019 में इंडस्ट्री की वैल्यू 6200 करोड़ थी, 2024 तक 25 हजार करोड़ रु. हो जाएगी

ऑनलाइन गेमिंग का रेवेन्यू 22% की रफ्तार से बढ़ रहा; 2019 में इंडस्ट्री की वैल्यू 6200 करोड़ थी, 2024 तक 25 हजार करोड़ रु. हो जाएगी

देश में ऑनलाइन गेमिंग का क्रेज तेजी से बढ़ रहा है। ऑल इंडिया गेमिंग फेडरेशन के मुताबिक, अभी देश में करीब 30 करोड़ ऑनलाइन गेमर हैं। रिपोर्ट्स के मानें तो 2022 तक इनकी संख्या 44 करोड़ तक पहुंच जाएगी। ऑनलाइन गेमिंग का रेवेन्यू भी 22% की रफ्तार से बढ़ रहा है।

गेमिंग का गणित

2023 तक रेवेन्यू 11 हजार 400 करोड़ रु. तक बढ़ने का अनुमान है। यह 2014 की तुलना में करीब 3 गुना है। तब रेवेन्यू 4400 करोड़ रु. था। दुनिया के गेमिंग मार्केट में सबसे ज्यादा हिस्सेदारी हिस्सेदारी एशिया-पैसिफिक की है। दुनिया ने 2019 में 11.25 लाख करोड़ रुपए का रेवेन्यू जनरेट किया। इसमें एशिया-पैसिफिक रीजन ने 5.34 लाख करोड़ रुपए की कमाई की।

2024 तक 4 गुना बढ़ जाएगी वैल्यू

  • ऑनलाइन गेमिंग की वैल्यू 2024 तक 4 गुना तक बढ़ने की उम्मीद है। यह 2019 में 6200 थी जबकि 2024 तक 25 हजार 30 करोड़ तक हो सकती है।
  • दुनिया में सबसे ज्यादा रेवेन्यू जनरेट करने वाला देश अमेरिका है। उसने 2.7 लाख करोड़ रु. कमाई की। चीन (2.2 लाख करोड़) दूसरे पर है।
  • 30 करोड़ ऑनलाइन गेमर हैं देश में। 2022 तक 44 करोड़ हो जाएंगे।
  • 60% से ज्यादा ऑनलाइन गेमर 24 साल से कम उम्र के हैं अभी देश में।
  • 55 मिनट औसत टाइम स्पेंड करता है एक ऑनलाइन गेमर प्रतिदिन।
  • 800 एमबी डेटा खर्च कर देता है एक गेमर प्रतिदिन गेम खेलने के दौरान।


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ऑनलाइन गेमिंग की वैल्यू 2024 तक 4 गुना तक बढ़ने की उम्मीद है। यह 2019 में 6200 थी जबकि 2024 तक 25 हजार 30 करोड़ तक हो सकती है। (प्रतीकात्मक)


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