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शनिदेव को कर्म प्रधान देवता माना जाता है यानी ये ग्रह हमें हमारे कर्मों का फल प्रदान करता है। साढ़ेसाती और ढय्या में शनिदेव वैसा ही फल प्रदान करते हैं, जैसे हमारे कर्म हैं। 23 जनवरी के बाद धनु, मकर और कुंभ राशि पर शनि की साढ़ेसाती रहेगी। मिथुन और तुला राशि पर शनि का ढय्या रहेगा। सूर्यदेव के पुत्र शनि की माता का नाम छाया है। यमराज इनके भाई और यमुना इनकी बहन है।
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शनिदेव उन लोगों के लिए शुभ रहते हैं जो लोग कड़ी मेहनत करते हैं। अनुशासन में रहने वाले, धर्म का पालन करने वाले लोगों पर शनि की विशेष कृपा रहती है। शनि के बुरे असर से बचने के लिए सभी का सम्मान करते हैं, कभी भी किसी गरीब व्यक्ति को न सताएं और भूलकर भी अपने माता-पिता का अनादर न करें, हमेशा सम्मान करें। अन्यथा किसी भी पूजा से शनि के दोष दूर नहीं हो सकते हैं।
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शनिदेव के लिए हर शनिवार सरसों का तेल दान करना चाहिए। काले तिल, काली उड़द और काले वस्त्रों का दान करने की भी परंपरा है। ये सभी चीजें शनि से संबंधित हैं। शनिदेव का स्वरूप काला ही है, इसीलिए इन्हें काली चीजें विशेष प्रिय हैं। शनिदेव को तेल चढ़ाते समय ध्यान रखें कि कि तेल इधर-उधर गिरना नहीं चाहिए। शनिवार को जूते-चप्पल का दान करना भी शुभ माना गया है।
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मान्यता है कि हनुमानजी की पूजा से शनि के दोष दूर होते हैं। इस संबंध में शनि और हनुमानजी से जुड़ी एक कथा प्रचलित है। कथा के अनुसार प्राचीन समय में शनिदेव ने हनुमानजी को युद्ध के लिए ललकारा था। इस युद्ध में हनुमानजी ने शनि को पराजित कर दिया था। युद्ध की वजह से शनि को भयंकर पीड़ा हो रही थी। तब उन्हें शरीर पर लगाने के लिए हनुमानजी ने तेल दिया था। तेल लगाते ही शनि को आराम मिल गया। शनि ने हनुमानजी को वरदान दिया था कि अब आपके भक्तों पर मेरा बुरा असर नहीं होगा। तभी से शनि को तेल चढ़ाने की परंपरा प्रचलित है।
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